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गैलीलियो गैलिली : वैज्ञानिक जिसने ब्रह्मांड सत्य बताने के बदले सज़ा पाई

सामान्य दर्शन के सिद्धांतों से दुनिया को आधुनिक विज्ञानं के पथ पर लाने का श्रेय आज ही के दिन अर्थात 15 फरवरी, 1565 को  इटली के पीसा में जन्मे महान विचारक, खगोलशास्त्री और वैज्ञानिक गैलीलियो गैलिली को जाता है। गैलीलियो गैलिली को आधुनिक विज्ञानं के पुनर्जागरण काल में वैज्ञानिक क्रांति का पिता कहते हैं। गैलीलियो आज के समय के अन्य वैज्ञानिकों से बहुत अलग थे  और उनकी शताब्दी में सदियों से चली आ रही धारणाओं को चुनौती देना कड़े दंड की मांग करने जैसा था, भले ही उस धारणा को नकारने का कोई वैज्ञानिक तर्क और मजबूत आधार ही क्यों न हो।  गैलीलियो भी ईसाईयों की ऐसी ही धर्मान्धता का शिकार हुए और चर्च की निराधार धारणाओं का अपमान करने के आरोप में उन्हें उम्रभर क़ैद की सजा भी मिली।  सदी के महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन उन्हें आधुनिक विज्ञानं के जनक तो स्टीफेन हॉकिंस उनपर टिप्पणी करते हुए कहते हैं ,"आधुनिक विज्ञान के जन्म और विकास के लिए  गैलीलियो शायद किसी भी अन्य वैज्ञानिक से ज्यादा ज़िम्मेदार हैं।"

गैलीलियो का जन्म विन्सौन्जो गैलिली नामक एक संगीतज्ञ के घर में हुआ था।  पिता  "ल्यूट" नामक वाद्य यंत्र बजाते थे जो बाद में गिटार और बैन्जो के रूप में विकसित हुआ। पिता ने वाद्य यंत्रों की तनी हुई डोरी के तनाव और उसकी ध्वनि की आवृत्ति के बीच गणितीय समीकरण स्थापित किया। बाद में इन परिणामों का विस्तृत अध्ययन  गैलीलियो गैलिली  ने किया।  गैलीलियो ने अपने प्रयोगों में पाया की प्रकृति के नियम एक-दूसरे कारकों पर निर्भर करते हैं और उनके संबंधों को गणितीय समीकरणों के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है और इसीलिए  गैलीलियो  ने एक बार कहा था,"ईश्वर की भाषा गणित है।"  बाद में प्रकाश की गति नापने का साहस भी  गैलीलियो ने ही किया। इसके लिए  गैलीलियो ने एक मित्र को रात में एक लालटेन के साथ एक पहाड़ी की चोटी पर भेज दिया और स्वयं कई मील दूर पहाड़ी की चोटी पर एक लालटेन के साथ बैठ गए। दूसरी चोटी से चमकती हुई लालटेन के प्रकाश की गति का आंकलन करना था। उन्होंने यही प्रयोग दो अन्य चोटियों के लिए किया जिनकी दूरी पहले से कहीं अधिक थी लेकिन इसबार भी गणना में कोई परिवर्तन नहीं आया। सुविधाओं और आवश्यक स्रोतों के अभाव में यह प्रयोग तो असफल रहा लेकिन विज्ञानं में निरंतर प्रयोग करने की उनकी यह मुहीम अद्वितीय थी और इसीलिए इन्हे प्रयोगात्मक विज्ञान का जनक माना जाता है। 



गैलीलियो एक धार्मिक व्यक्ति थे लेकिन धर्मग्रथों में लिखे तथ्यों को वह विज्ञान से सिद्ध करना चाहते थे। वर्ष 1609 में उन्हें हॉलैंड में बने एक दूरबीन के बारे में पता चला जिसकी सहायता से खगोलीय पिंडों की गति और स्थिति का आंकलन किया जा सकता था।  गैलीलियो ने ऐसा सुनकर स्वयं ही उस दूरबीन से ज्यादा आधुनिक और उन्नत किस्म की दूरबीन विकसित कर ली। अपने प्रेक्षणों के आधार पर वह इस नतीजे पर पहुंचे कि पृथ्वी और अन्य सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं।  उस समय की धारणा यह थी की पृथ्वी बीच में है और सूर्य, चन्द्रमा और सभी ग्रह पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं और इस अवधारणा को चर्च का समर्थन प्राप्त था।  लगभग सौ वर्ष पहले कॉपरनिकस ने भी यही बात कही थी जिसके बाद उन्हें चर्च के दंड का पात्र बनना पड़ा था। गैलीलियो ने जैसे ही अपने प्रयोग के परिणाम सार्वजनिक किये, उनके साथ भी यही हुआ। चर्च ने  गैलीलियो  के प्रेक्षण के परिणामों को अपनी अवज्ञा मानते हुए कारावास का दंड दिया। वर्ष 1633 में 69 वर्षीय गैलीलियो को चर्च ने यह आदेश दिया कि वे सार्वजनिक तौर पर माफी मांगते हुये यह कहें कि धार्मिक मान्यताओं के विरूद्व दिये गये उनके सिद्वांत उनके जीवन की सबसे बडी भूल थी जिसके लिये वे शर्मिंदा हैं। उन्होने ऐसा ही किया  लेकिन इसके बाद भी उन्हें कारावास में डाल दिया गया। स्वास्थ्य बिगड़ने के कारण उनकी सजा को गृह क़ैद में बदल दिया गया और अपने जीवन के अंतिम दिन भी उन्होंने इसी क़ैद में काटे। 

ईसाईयों के धर्मगुरु पोप की निगरानी में रहने वाले पवित्र शहर वैटिकन सिटी स्थित ईसाई धर्म की सर्वोच्च संस्था ने वर्ष 1992 में यह स्वीकार किया कि गैलीलियो को सजा देना उनकी गलती थी। इस तरह वर्ष 1633 में महान खगोलशास्त्री, गणितज्ञ और वैज्ञानिक को सच बोलने के कारण स्वयं की धर्मांधता के कारण सज़ा देने की जो ऐतिहासिक भूल चर्च द्वारा की गई थी उसे सुधारने में चर्च को साढ़े तीन सौ साल से भी अधिक का समय लगा। वर्ष 2009 को अंतर्राष्ट्रीय खगोलिकी वर्ष के रूप में मनाने का निर्णय चर्च द्वारा अपनी ऐतिहासिक भूल का प्रायश्चित्त करने के लिए था। 

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