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मंजिले

मंजिले

मंजिले

हम चले कुछ इस तरह , मस्त मस्त झूमते

हम बढे कुछ इस तरह, मंज़िलों को चूमने

कोई गिरा, कोई उठा

हमको थी न कुछ गिला

कोई झुका कोई बढ़ा , हमको था ना कुछ पता

हम तो बस चलते रहे

चलते रहे,बढ़ते  रहे

दिल का एक ख्वाब था ,बनेंगे हम भी कुछ

वर्षो से अरमान था, करेंगे हम भी कुछ

किसे पता था क्या होगा,उन अनजानी रहो में

किसने सोचा था राहों के अंधियारो क बारे में

पर अब मंज़िल पायी है,तो अधिकारों से क्या डरना

तूफ़ान बनकर के,अब इन बयारों  से क्या डरना

मंज़िल पर आकर लगता है,जैसे एक पड़ाव है

लगता मज़िल बड़ी दूर है यह तो  उसकी छाँव है

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