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सलाम इंडिया : 'लेडी टार्जन' जमुना टुडू हैं तो जंगल सुरक्षित है

सलाम इंडिया : 'लेडी टार्जन' जमुना टुडू हैं तो जंगल सुरक्षित है

सलाम इंडिया : 'लेडी टार्जन' जमुना टुडू हैं तो जंगल सुरक्षित है

भारत जैसे पुरुष प्रधान देश में तथाकथित औरों से पिछड़ी माने जाने वाली आदिवासी समुदाय की महिलाओं का समूह देश की सबसे महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक सम्पदा जंगल और उसकी हरियाली को बचाने के लिए यदि जान दांव पर लगाकर क्रूर वन माफियाओं से लोहा ले तो यह भारतीय समाज में एक असाधारण घटना है जिसे सभी देशवासियों को सलाम करना चाहिए और मिसाल के तौर पर पूरे देश में ऐसे प्रेरणादायक साहस का प्रचार भी होना चाहिए। आइये जानते हैं भारत के ऐसे ही आदिवासी वीरांगनाओं के एक समूह के बारे में जो हरियाली को बचाने के लिए आखरी सांस तक संघर्ष करने के लिए प्रतिबद्ध है।

झारखंड राज्य के पूर्वी सिंहभूम जिले के मुतुर्खुम गांव में आदिवासी महिलाओं का समूह वहां के जंगल की रक्षा के लिए प्रतिदिन तड़के भोर में गश्त पर निकल जाता है। गांव के आसपास का जंगल बहुमूल्य 'साल' के वृक्षों से भरा पड़ा है जिसकी तस्करी वन माफिया द्वारा की जाती रही है। मजबूत डंडों , तीर-धनुष,भाले और पानी की बोतलों से लैस इस समूह का नेतृत्व सैंतीस वर्षीय जमुना टुडू करती है जिनका विवाह इसी गाँव में वर्ष 1998 में हुआ था। जमुना ने कड़े संघर्षों के बाद इस 'वन सुरक्षा समिति' का गठन किया था जिसमे आज 60 सक्रिय महिला सदस्य हैं जो दिन में तीन बार जंगल में बारी-बारी से सुबह-दोपहर-शाम गस्त पर जाती हैं और नज़र रखती हैं कि कहीं कोई वन माफिया उनके जंगल में अवैध कटाई तो नहीं कर रहा। कई बार वन माफिया से आमने-सामने की टक्कर के बाद इन वीरांगनाओं को लहूलुहान भी होना पड़ा है। चूँकि लूट की लकड़ी का अवैध कारोबार रेलवे के सहारे चलता था, जमुना ने रेलवे अधिकारीयों को भी इस कारोबार पर रोक लगाने के लिए मनाया।रेलवे स्टेशन से वापस लौटने पर कई बार माफिया द्वारा इनके ऊपर घातक हमले किये गर और पत्थर भी बरसाए गए।

हालाँकि शुरुआत में जमुना को बहुत निराशा हुई जब उन्हें गाँव के महिलाओं का साथ नहीं मिला जिनका कहना था कि इसके लिए उन्हें पुरुषों के विरुद्ध जाना होगा। लेकिन बाद में दसवीं तक पढ़ी-लिखी जमुना ने गाँव के लोगों से प्रश्न करना शुरू किया कि यदि जंगल ही नहीं होंगे तो हम सब सांस कैसे लेंगे और जंगल में रहने वाले सभी जीव-जंतु कहाँ जाएंगे।घर-घर जाकर समझाने के बाद वर्ष 2004 तक जमुना की टीम में मात्र 4 सदस्य थीं लेकिन जमुना ने हार नहीं मानी और धीरे-धीरे ही सही लेकिन इस अभियान को महिलाओं के साथ पुरुषों का भी समर्थन मिलने लगा।अब सभी उन्हें गर्व से लेडी टार्जन पुकारते हैं।

 

आज जब गाँव में किसी के घर बेटी पैदा होती है तो 18 "साल" के वृक्ष लगाए जाते हैं और जब उस लड़की का विवाह होता है तो उसमे से 10 "साल" के वृक्ष परिवार को दिए जाते हैं।रक्षा बंधन का त्यौहार पूरा गाँव सामूहिक रूप से वृक्षों को राखी बाँध कर मनाता है।जमुना की बदौलत सारा गांव वन विभाग से जुड़ गया और वन विभाग ने भी गाँव के विकास में पूरा सहयोग दिया।जमुना की बदौलत आज इस आदिवासी गांव में अच्छा विद्यालय और पक्की सड़के हैं। विद्यालय और नलकूप के लिए जमुना ने अपनी भूमि भी दान कर दी।

आपको जानकर हैरानी होगी कि जमुना द्वारा शुरू किया गया यह आंदोलन पूरे देश में फैल चुका है।जमुना द्वारा वनों की रक्षा के लिए लगभग 150 समितियां बनाई जा चुकी हैं जिनमे लगभग 6000 सदस्य हैं।

सम्मान :

जमुना को वर्ष 2013 में 'एक्ट ऑफ सोशल करेज' की श्रेणी में गॉडफ्रे फिलिप्स ब्रेवरी अवार्ड और 2014 में स्त्री शक्ति अवार्ड दिया गया।वर्ष 2016 में उन्हें महामहिम राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रपति भवन में सम्मानित किया गया जब उन्हें भारत की प्रथम 100 महिलाओं में चुना गया था।2017 में नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत द्वारा उन्हें वन संरक्षण के लिए वीमेन ट्रांसफार्मिंग इंडिया अवार्ड दिया गया। उनके ऊपर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म भी बन चुकी है।

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