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स्वामी विवेकानंद से जुड़ी ये बातें नहीं जानते होंगे आप | Things you did not know about Swami Vivekanand

स्वामी विवेकानंद के बारे में हर कोई जानता हैं लेकिन उनके दार्शनिक विचारों के बारे में बहुत से लोग नहीं जानते। स्वामी विवेकानंद को दुनियाभर में महान दार्शनिक के तौर पर जाना जाता है। स्वामी विवेकानंद जी वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु थे। इन्होंने भारत के उत्थान में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। आज हम आपको स्वामी विवेकानंद से जुड़ी ऐसी बातें बताने जा रहे हैं जिनसे शायद आप अब तक अनभिज्ञ हो। 

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स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को एक कुलीन बंगाली परिवार में कोलकाता में हुआ था। इनका असली नाम नरेंद्र नाथ था। बाद में दुनियाभर में ये स्वामी वि‍वेकानंद के नाम से जाने गए। स्वामी विवेकानंद ने दुनियाभर में हिंदु धर्म और हिंदुत्व का खूब प्रचार प्रसार किया।

जब भी स्वामी जी की बात होती है तो इनके विश्व धर्म परिषद् में दिए गए भाषण की बात जरूर होती है। ये भाषण इन्होंने अमरीका के शिकागो में साल 1893 में दिया था, जहां इन्होंने ना सिर्फ सनातक धर्म बल्कि भारत का भी खूब समर्थन किया। इनके इस भाषण के कारण ही हिंदु धर्म ना सिर्फ दुनियाभर के लोगों के लिए आकर्षण बना बल्कि भारत की एक मजबूत छवि भी सामने आई। हालांकि इस धर्म परिषद में सबने कोशिश की थी कि उन्हें भाषण देने का मौका ना मिले। उस समय अमेरिका और यूरोप के लोग भारतीयों को हीन दृष्टि से देखा करते थे। लेकिन विवेकानंद जी का भाषण सुनकर उस समय हर कोई चकित रह गया था।

इसके बाद तो स्वामी जी के अमेरिका में कई भक्त हुए। उन्होंने तीन साल तक अमेरिका में रहकर ना सिर्फ कई शिष्य बनाए बल्कि रामकृष्ण मिशन की बहुत सी शाखाएं भी अमेरिका में खोली। स्वामी विवेकानंद जी मानते थे कि 'अध्यात्म-विद्या और भारतीय दर्शन के बिना ये दुनिया अनाथ हो जाएगी।  

स्वामी विवेकानंद के नरेंद्र से विवेकानंद बनने की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। नरेंद्र नाथ जी बचपन से ही तीव्र बुद्धि के थे। विवेकानंद जी ने स्वामी रामकृष्ण परमहंस की बहुत तारीफ सुनी थी। एक बार वे उनके तर्क-वितर्क करने पहुंच गए। परमहंस जी से मिलकर नरेंद्र नाथ जी को ना सिर्फ आत्म साक्षात्कार हुआ बल्कि इसके बाद तो वे परमहंस जी के सबसे प्रिय शिष्य बन गए। सन्यास लेने के बाद नरेंद्र नाथ से वे विवेकानंद बने। 

विवेकानंद जी परम गुरूभक्त और गुरूसेवा थे। गुरू के प्रति उनकी निष्ठा आश्चकर्यजनक थी। अपने गुरू परमहंस के बीमार पड़ने पर एक गुरूभाई को सबक सिखाने के लिए विवेकानंद जी ने अपने गुरू के रक्त और कफ से भरे थूकदान को पी लिया था। अपनी निष्‍ठा के कारण ही विवेकानंद जी अपने गुरू के उच्च आर्दशों को दुनियाभर तक ले जा गए। 

विवेकानंद जी ने बहुत छोटी उम्र में ही वेद और दर्शनशास्त्र का ज्ञान हासिल कर लिया था। 25 साल की उम्र में विवेकानंद जी ने गेरूआ वस्त्र धारण कर सन्‍यास लेकर पैदल ही पूरे भारत की यात्रा की। स्वामी जी खुद को हमेशा गरीबों का सेवक कहा करते थे। भारत के गौरव को देश-देशांतरों में उज्ज्वल करने का उन्होंने सदा प्रयत्न किया।

स्वामी विवेकानंद जी जानते थे कि वे 40 की उम्र पार नहीं कर पाएंगे। उन्होंने पहले ही भविष्य वाणी कर दी थी कि दमा और शुगर की बीमारी के कारण वे 40 की उम्र से पहले ही ये संसार त्याग देंगे। उनकी बात सही निकली उन्होंने 39 साल की उम्र में ही 4 जुलाई 1902 को बेलूर स्थित रामकृष्णव मठ में ध्यान लगाते हुए समाधि ले ली। स्वामी विवेकानंद जी का अंतिम संस्कार बेलूर के ही उसी गंगा तट पर किया गया जहां दूसरी ओर उनके गुरुजी रामकृष्ण परमहंस का अन्तिम संस्कार हुआ था।

भारत में स्वामी विवेकानंद जी को एक देशभक्त संन्यासी के रूप में जाना जाता है और उनके जन्मदिन को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।

स्वामी विवेकानंद जी अनमोल विचार आज भी लोगों की जुबां पर हैं। उनमें से कुछ विचारों को यहां भी बता रहे हैं- 

  • जब तक जीना, तब तक सीखना, अनुभव ही जगत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है।
  • जितना बड़ा संघर्ष होगा जीत उतनी ही शानदार होगी।
  • पढ़ने के लिए जरूरी है एकाग्रता, एकाग्रता के लिए जरूरी है ध्यान। ध्यान से ही हम इन्द्रियों पर संयम रखकर एकाग्रता प्राप्त कर सकते है।
  • पवित्रता, धैर्य और उद्यम- ये तीनों गुण मैं एक साथ चाहता हूं।
  • उठो और जागो और तब तक रुको नहीं जब तक कि तुम अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर लेते।
  • ज्ञान स्वयं में वर्तमान है, मनुष्य केवल उसका आविष्कार करता है। 
  • एक समय में एक काम करो, और ऐसा करते समय अपनी पूरी आत्मा उसमे डाल दो और बाकी सब कुछ भूल जाओ।
  • जब तक आप खुद पर विश्वास नहीं करते तब तक आप भगवान पर विश्वास नहीं कर सकते।
  • ध्यान और ज्ञान का प्रतीक हैं भगवान शिव, सीखें आगे बढ़ने के सबक 
  • लोग तुम्हारी स्तुति करें या निन्दा, लक्ष्य तुम्हारे ऊपर कृपालु हो या ना हो, तुम्हारा देहांत आज हो या युग में, तुम न्यायपथ से कभी भ्रष्ट न हो।
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स्वामी जी के कुछ शिक्षा दर्शन सिद्धान्त भी खूब प्रचलित हुए- 

  • शिक्षा ऐसी हो जिससे बालक का शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक विकास हो सके।
  • शिक्षा ऐसी हो जिससे बालक के चरित्र का निर्माण हो, मन का विकास हो, बुद्धि विकसित हो तथा बालक आत्मनिर्भर बने।
  • बालक एवं बालिकाओं दोनों को समान शिक्षा देनी चाहिए।
  • धार्मिक शिक्षा, पुस्तकों द्वारा न देकर आचरण एवं संस्कारों द्वारा देनी चाहिए।
  • पाठ्यक्रम में लौकिक एवं पारलौकिक दोनों प्रकार के विषयों को स्थान देना चाहिए।
  • शिक्षा, गुरू गृह में प्राप्त की जा सकती है।
  • शिक्षक एवं छात्र का सम्बन्ध अधिक से अधिक निकट का होना चाहिए।
  • सर्वसाधारण में शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार किया जान चाहिये।
  • देश की आर्थिक प्रगति के लिए तकनीकी शिक्षा की व्यवस्था की जाय।
  • मानवीय एवं राष्ट्रीय शिक्षा परिवार से ही शुरू करनी चाहिए।

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