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‘किसी के तन बदन में आग लगती है तो लगने दो, ये उसका मामला है’ - सच के सबसे कड़वे, शर्मनाक और समाज के मोटे परदे में छिपे हुए पक्ष को बेहद  निर्ममता से लिखने की हिम्मत अगर किसी ने की तो ‘मंटो’ ने की । गुलामी के उस दौर में जब सच बोलने पर पाबन्दी थी, मंटो ने फिरंगियों के खिलाफ भी लिखा और अपने ही समाज में व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ भी। इसलिए वह झूठ और स्वार्थ के मोटे पर्दों में रहने वाले अपने ही लोगों के दुश्मन हो गए। मंटो ने नंगे सच का सच्चा पोस्टमार्टम किया जिसे समाज के कई हिस्सों ने बर्दाश्त नहीं किया और यही कारण है कि मंटो के बारे में कहते हैं कि वह बदनाम तो था लेकिन गुमनाम नहीं।

‘किसी के तन बदन में आग लगती है तो लगने दो, ये उसका मामला है’ - सच के सबसे कड़वे, शर्मनाक और समाज के मोटे परदे में छिपे हुए पक्ष को बेहद  निर्ममता से लिखने की हिम्मत अगर किसी ने की तो ‘मंटो’ ने की । सआदत हसन मंटो उर्दू के एकमात्र कहानीकार हैं जिसकी दुश्मनी उसके पाठकों से ही रही और शायद उतने ही दोस्त भी उसने बनाए होंगे। बहरहाल दोनों ही परिस्थितियों में मंटो को पढना तो पड़ेगा ही, चाहे उसे गाली देने के लिए ही सही। उसे मोहब्बत करने वाले भी दुनिया में कम नहीं हैं और अब तो मंटो को ‘आइना दिखाने वाला’ कहानीकार भी कहते हैं। पिछले कुछ दशकों में मंटो को सबसे ज्यादा पढ़ा गया और उसको पढ़ने वालों की तादाद सरहद के इस पार कहीं ज्यादा है। खैर, वो शख्स था भी तो दोनों तरफ का लेकिन जब उसने खुद तो ढूँढा तो दोनों मुल्कों के दरम्यान खाली पड़ी ज़मीन पर खुद को लेटा पाया। उसने अपनी ही कहानी में लिखा “उधर खरदार तारों के पीछे हिंदुस्तान था, इधर वैसे ही तारों के पीछे पाकिस्तान, दरमियान में ज़मीन के उस टुकड़े पर जिसका कोई नाम नहीं था, टोबा टेक सिंह पड़ा था”

मंटो ने हिंदुस्तान और पाकिस्तान की आज़ादी के बारे में एक बार लिखा था कि ‘जिस परिंदे को पर काट कर आज़ाद किया जाएगा उसकी आज़ादी कैसी होगी”

हिंदुस्तान के पंजाब में पहली सांस और पाकिस्तान के पंजाब में आखरी सांस लेने वाले मंटो के दर्द की दवा तो शायद किसी के पास न थी लेकिन मंटो ने बंटवारे से लाखों लोगों को मिले दर्द में अपने दर्द को मिलाकर अपने अफसानों में ऐसे पेश किया कि लोगों ने उनकी कहानियों में अपनी ज़िन्दगी ढूंढ ली। मंटो के लिए तो वह सिर्फ पंजाब था- न पूर्वी न पश्चिमी और तब न बंटा हुआ हिंदुस्तान और पाकिस्तान।

मंटो हाशिये पर पड़े लोगों की आवाज थे। मंटो ने उन पहलुओं को छुआ जो सदियों से समाज के बंद दरवाजों में क़ैद थे। उन्होंने औरत के तीन रूपों लड़की, गृहणी और वैश्या पर बेबाकी से लिखा। उन्होंने अपनी कहानियों में औरतों को इंसान माना। उन्होंने महिलाओं की संवेदनाओं को बेबाकी से रखा तो उन्हें सभ्य समाज ने अश्लील करार दे दिया। परिणामस्वरूप उनकी पांच कहानियों पर मुक़दमे चलाए गए जिनके शीर्षक हैं- काली सलवार, धुंआ, बू, ठंडा घोषत और ऊपर,नीचे और दरमिया।

अश्लीलता के आरोप पर मंटो का कहना था - अगर आपको मेरी कहानियां अश्लील या गंदी लगती हैं, तो जिस समाज में आप रह रहे हैं, वह अश्लील और गंदा है। मेरी कहानियां तो केवल सच दिखाती हैं।

माथे पर लटकी हुई ज़ुल्फ़ और मोटा चश्मा लगाए मंटो ने समाज की परते उधाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इन्कलाब और बंटवारे की त्रासदी से लेकर इश्क़, हिन्दू-मुसलमान और समाज के घिनौने सच पर बड़ी हिम्मत और ईमानदारी से लिखने वाले मंटो को कमलेश्वर ने दुनिया का सबसे बड़ा कहानीकार कहा।  

मात्र बयालीस साल, आठ महीने और सात दिन की छोटी सी ज़िन्दगी में मंटो ने 230 कहानियाँ, 67 रेडियो नाटक, 22 ख़ाके (शब्द चित्र) और 70 लेख लिखे। आज भी तथाकथित ‘सभ्य समाज’ उनकी कहानियों को पढ़ते हुए तिलमिला उठता है क्योंकि आज भी समाज के घिनौने सच को स्वीकार करने की हिम्मत सभी में पैदा नहीं हुई है। ये इत्तेफाक ही था कि एक तरफ 18 जनवरी 1955 को इस बेधड़क, सहज और जिंदादिल कहानीकार की लिखी हुई मिर्ज़ा ग़ालिब फिल्म हाउसफुल चल रही थी और दूसरी तरफ वह शराब की बुरी लत की वजह से इस दुनिया को अपने ही तेवर में अलविदा कह रहा था।

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