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इसरो : एक सरकारी संगठन ऐसा भी जिसकी क़द्र दुनिया करती है

इसरो : एक सरकारी संगठन ऐसा भी जिसकी क़द्र दुनिया करती है

आज के दौर में जब सरकारी विभागों की कार्यशैली लचर, धीमी और भ्रष्टाचार पर आधारित मानी जाती है और गुणवत्ता के दृष्टिकोण से लोगों का भरोसा जीतने में नाकाम रही है, एक सरकारी संस्था ऐसी भी है जिसने न सिर्फ भारत के लोगों के जन-मन में विश्वास जगाया है बल्कि आज की तारीख में पूरी दुनिया अपने उपग्रहों के अंतरिक्ष में प्रक्षेपण से लेकर अनुसंधान के क्षेत्र तक इस इस भारतीय संस्था पर भरोसा कर रही है।

हम बात कर रहे हैं भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की जिसने बीते दशकों में अंतरिक्ष में भारत का परचम शान से फहराया है और और अपनी लगन की बदौलत भारत को विश्व के उन चुनिंदा देशों में ला खड़ा किया है जो अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में विशेष दक्षता रखते हैं।

अभी हाल ही में इसरो ने अपने पृथ्वी पर्यवेक्षण उपग्रह कार्टोसेट-2 का प्रक्षेपण कर ख़ास मुकाम हासिल कर लिया है। कार्टोसेट-2 के साथ ही 30 अन्य उपग्रह प्रक्षेपित किये गए और खास बात ये है कि सभी उपग्रह दो अलग कक्षाओं में स्थापित किये गए। एक ही यान से उपग्रहों को अलग-अलग कक्षाओं में स्थापित करना भी महान उपलब्धि है और ऐसा पहले नहीं किया गया है। आपको जानकर हर्ष होगा कि प्रक्षेपित किये गए कुल 31 उपग्रहों में से 28 उपग्रह ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, दक्षिण कोरिया, फ्रांस और फ़िनलैंड जैसे देशों के हैं जो अपने उपग्रहों के प्रक्षेपण कराने के बदले इसरो को करोड़ों रुपयों की रक़म भी चुकाते हैं । हालाँकि इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि विश्व के बड़े विकसित देश भारत की अंतरिक्ष तकनीक पर पूर्णतः विश्वास कर रहे हैं अन्यथा वे इतने महंगे उपग्रहों के प्रक्षेपण का काम इसरो को नहीं देते। ऐसे देश ऐसी सेवाएँ अब नियमित रूप से इसरो से लेने लगे हैं। कार्टोसेट-2 को इसरो के सबसे विश्वसनीय पीएसएलवी सी-40 यान की सहायता से प्रक्षेपित किया गया। गौरतलब है की इसरो का पिछला अभियान पीएसएलवी सी-39 हीट शील्ड न खुल पाने के कारण असफल रहा था लेकिन इसरो ने अपने और दुसरे देशों के अनुभवों से बहुत कुछ सीखते हुए बड़े सुधार किये और यही कारण है कि इस संगठन के असफल होने की दर सभी देशों से बहुत कम है।अभी बीते साल इसरो ने एक साथ 104 उपग्रह प्रक्षेपित करने विश्व कीर्तिमान बनाया था जो कि इससे पहले रूस का था जिसने एक साथ 37 उपग्रह प्रक्षेपित किये थे। प्रक्षेपित किये गए उपग्रहों में 96 तो अमेरिका के ही थे जो इसरो की कारोबारी क्षमता को सत्यापित करता है।

मंगल ग्रह पर पहुँचने की कोशिश में अमेरिका को छः बार असफलता का स्वाद चखना पड़ा वहीँ भारत से कहीं उन्नत प्रतिद्वंदी चीन का मंगल अभियान यंगहाउ-1 2011 में असफल रहा था और जापान का मंगल मिशन ईंधन ख़त्म होने के कारण 1998 में असफल हो गया था। लेकिन इसरो ने पहले ही प्रयास में मंगलयान को मंगल ग्रह की कक्षा में स्थापित करके समस्त विश्व को स्तब्ध कर दिया। अमेरिका, यूरोपीय संघ और रूस के बाद भारत ही है जिसका मंगल अभियान सफल रहा है और भारत विश्व में पहला ऐसा देश है जिसने यह सफलता अपने पहले प्रयास में प्राप्त की है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का मंगल अभियान मावेन का कुल खर्च भारतीय मंगल अभियान का लगभग दस गुना था। भारत ने मंगलयान पर कुल 450 करोड़ रूपये ही खर्च किये जो भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान के किफायती और उच्चतम गुणवत्ता के होने को सत्यापित करता है।

आपको जानकर हैरानी होगी कि जब इसरो की स्थापना सन 1962 में प्रसिद्द विद्वान डॉक्टर विक्रम साराभाई द्वारा की गई थी तब पहले रॉकेट को प्रक्षेपण स्थल तक साइकिल पर लाद कर ले जाया गया था और दुसरे अभियान में रॉकेट चूँकि काफी बड़ा और भारी था तो उसे बैलगाड़ी पर लाद कर ले जाया गया था। एनडीटीवी के अनुसार पहले प्रक्षेपण के लिए नारियल के पेड़ों को लांच पैड बनाया गया था।

साइकिल और बैलगाड़ी से राकेट ढ़ोने से शुरू हुए इसरो को आज विश्वभर के उपग्रहों का अंतरिक्ष में प्रक्षेपण करते देखना सभी भारतीयों के लिए गर्व का विषय तो है लेकिन साथ ही भारत के अन्य सरकारी विभागों को इसरो से सीखना चाहिए। भ्रष्टाचार के विश्व कीर्तिमान स्थापित करने में व्यस्त अन्य सरकारी विभाग और नेताओं को इसरो की कर्तव्यनिष्ठा, देशभक्ति और विभाग एवं देश का नाम ऊंचा करने की प्रबल इच्छा से सबक लेना चाहिए।

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