Bollywood Fashion Sports India Beauty Food Health Global Travel Today Tales Facts Others

हमारे विश्वास का आधार क्यों नहीं बन पा रहा ‘आधार’

हमारे विश्वास का आधार क्यों नहीं बन पा रहा ‘आधार’

मात्र 12 अंकों के आधार में हमारे नाम, फोटो, फ़ोन नंबर, ईमेल आईडी और घर का पता जैसी सूचनाओं के साथ-साथ हमारी उँगलियों के निशान व आँखों की पुतली के निशान जैसी अति महत्वपूर्ण व गुप्त पहचान छिपी होती है जिसे हम या तो पूर्ण रूप से भरोसा करके सरकार को सौंप देते हैं या सरकार हमसे जबरदस्ती छीन लेती है | आधार प्रणाली पर भरोसा न करने वालों की दलील है कि भारतीय संविधान का भाग 3 सभी भारतीयों को स्वतंत्रता और समानता का अधिकार सहित अनेक मूल अधिकार देता है और प्राइवेसी अर्थात निजता भी मूल अधिकार ही है अतः आधार मौलिक अधिकारों का हनन करता है| अनुच्छेद 21 भी लोगों को स्वतंत्रता का अधिकार देता है और बिना निजता के स्वतंत्रता संभव नहीं हो सकती | कई संगठनों ने आधार की वैधता पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए याचिकाएं दायर की हैं  और उच्चतम न्यायालय में सुनवाई जारी है और कभी भी आधार पर फैसला सुनाया जा सकता है | वहीँ सरकार पारदर्शिता लाने, गड़बड़ी और फर्जीवाड़ा रोकने के नाम पर बैंक खातों से लेकर मोबाइल नंबर भी आधार से जोड़ रही है |

आधार को लेकर सबसे बड़ा खतरा करोड़ों लोगों के बायोमैट्रिक पहचान जैसी अति महत्वपूर्ण और गोपनीय जानकारी का गलत हाथों में चले जाने का है जिसका दुरूपयोग संभव है | यही कारण है की बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से लेकर मशहूर संगीतकार विशाल डडलानी तक इसके विरोध में उतर चुके हैं | आपको बताते चलें कि आधार के निर्माण का ठेका निजी कंपनियों को दिया गया है जो हमारी आशंकाओं को और मजबूत करती हैं कि निजी कम्पनियां अपने हितों के लिए हमारी गुप्त सूचनाएं गलत हाथो में बेच सकती हैं और ये सूचनाएं हमारे देश की सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण हैं |

हाल ही में अख़बार ‘द ट्रिब्यून’ में छापी गई रचना खेड़ा की एक रिपोर्ट के मुताबिक चंद रुपयों में करोड़ों लोगों की गुप्त जानकारी खरीदी जा सकती है जिसके बाद यूआईडीएआई ने अख़बार के आरोपों को खारिज करते हुए उल्टा रचना और अख़बार के खिलाफ ही शिकायत दर्ज करा दी थी | हालाँकि उसने माना था की अधिकारीयों द्वारा उसकी सर्च सुविधा का दुरूपयोग संभव है लेकिन कोई सूचना लीक नहीं हुई है|

पत्रकार रचना की रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि आधार की खुफिया जानकारी रखने वाले लोगों के व्हाट्सएप ग्रुप में उन्हें बड़ी आसानी से मात्र 500 रूपये देकर आधार की सूचना हासिल करने वाली सेवा खरीदी और 100 करोड़ आधार का एक्सेस प्राप्त कर लिया | एजेंट ने मात्र 10 मिनट में गेटवे और लॉग इन आईडी और पासवर्ड दे दिया और अब करोड़ों लोगों की गोपनीय जानकारी उनकी मुट्ठी में थी | उन्होंने आगे बताया कि मात्र 300 रूपये अधिक देकर उन्होंने आधार कार्ड छापने का सॉफ्टवेयर भी प्राप्त कर लिया |

अख़बार और रिपोर्टर के खिलाफ यूआईडीएआई के कार्रवाही की कड़ी आलोचना की जा रही है | पत्रकारों और एडिटर्स गिल्ड जैसी संस्थाओं ने तुरंत शिकायत वापस लेने की मांग की है वहीँ ‘द ट्रिब्यून’ ने रिपोर्ट को कानूनी रूप से पूरी तरह वैध बताया है |

इस मामले का महत्व तब और बढ़ गया जब इन्टरनेट पर गुप्त सूचनाओं का खुलासा कर तहलका मचाने के लिए जाने जाने वाले कंप्यूटर प्रोफेशनल एडवर्ड स्नोडेन ने इस मुद्दे पर पत्रकार के समर्थन में ट्वीट किया | उन्होंने लिखा कि ‘आधार लीक’ का खुलासा करने वाले पत्रकार पुरस्कार के हकदार हैं न कि किसी जांच के | अगर सरकार को सही में चिंता है तो उसे उन नीतियों में बदलाव करना चाहिए जिसके कारण करोड़ों की निजता खतरे में है | उन्होंने ये भी लिखा कि अगर किसी को गिरफ्तार करना है तो वो यूआईडीएआई है | एडवर्ड स्नोडेन ने आधार पर चिंता व्यक्त करते हुए पहले भी कहा है कि भारत में आधार का दुरूपयोग हो सकता है |

हालाँकि बाद में कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने ट्वीट कर सफाई देते हुए कहा था की सरकार प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर तत्पर है और उसकी दृष्टि आधार की सुरक्षा पर भी है | उन्होंने लिखा की एफआईआर अज्ञात व्यक्ति की खिलाफ हुई है और साथ ही उन्होंने यूआईडीएआई से कहा की वह अख़बार और रिपोर्टर से जांच में सहायता करने का निवेदन करे ताकि असली अपराधियों तक पहुंचा जा सके |

सरकारी योजनाओं का लाभ सभी को मिले, पारदर्शिता हो और फर्जीवाडा रुके ये तो सभी चाहते हैं लेकिन इनके बदले करोड़ों लोगों की अति गोपनीय और महत्त्वपूर्ण जानकारियों का सौदा किया जाय यह कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है ?

Comments

Trending