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क्या हुआ जो न्यायाधीश ही न्याय की मांग पर इस तरह उतर आए ..

क्या हुआ जो न्यायाधीश ही न्याय की मांग पर इस तरह उतर आए ..

आज के इस दौर में जब लोकतंत्र के दो स्तम्भ कार्यपालिका और विधायिका लोगों का भरोसा जीतने में नाकाम रहे हैं एक तीसरा स्तम्भ न्यायपालिका ही है जो घनघोर अँधेरे में लोकतंत्र की रक्षा के लिए एक शक्तिशाली प्रकाश पुंज के रूप में खड़ी रहती है। बीते कई दशकों का इतिहास बताता है कि चरमरा रही व्यवस्था को सुधारने और अनुशासित करने में न्यायपालिका का अद्भुत योगदान रहा है। आज कल तो ‘ज्युडिशियल एक्टिविज्म’ अपने चरम पर है और पुराने कानूनों को चुनौती देने और बदलने से लेकर नए कानून बनाने तक का काम माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा ज़िम्मेदारी से किया जा रहा है। 

भ्रष्ट और निष्क्रिय व्यवस्था से तंग आकर एक व्यक्ति जब कहता है कि ‘आई विल सी यू इन कोर्ट’ तब उसके मन में न्यायालय से न्याय मिलने का अटूट भरोसा होता है और न्यायाधीश उसके लिए न्याय का देवता होता है जो पूर्णतः स्वतंत्र और निष्पक्ष होता है। लेकिन बीते कल देश के उच्चतम न्यायालय के चार प्रमुख जजों द्वारा मुख्य न्यायाधीश पर लगाए गए आरोप इस देश के महान लोकतंत्र की न्यायपालिका के स्वतंत्र और निष्पक्ष होने पर सवाल खड़े करते हैं । 

देश के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम जज जस्टिस जे चेलामेश्वर  जस्टिस मदन बी लोकुर, जस्टिस कुरियन जोसेफ और जस्टिस रंजन गोगोई मीडिया के सामने आए और शीर्ष अदालत पर गंभीर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट को बचाने की अपील यह कहते हुए की कि वह लोकतंत्र को बचाना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि इस संस्था को बचाने के लिए उन सभी ने भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को समझाने की कई बार कोशिश की है लेकिन वे नाकाम रहे और अंततः वे मजबूर होकर मीडिया के सामने आए। जस्टिस जे चेलामेश्वर  ने कहा की देश की शीर्ष अदालत का कामकाज ठीक से नहीं चल रहा और पिछले कुछ महीनों में बहुत सी ऐसी चीज़ें हुई हैं जो नहीं होनी चाहिए थीं। 

 

यह प्रेस कॉन्‍फ्रेंस जस्टिस जे. चेलामेश्वर के घर पर हुई। उन्होंने कहा कि यदि संस्था को नहीं बचाया गया तो लोकतंत्र भी सुरक्षित नहीं रहेगा। उन्होंने कहा कि उन्हें मजबूर होकर मीडिया के सामने बात रखनी पड़ रही है ताकि 20 साल बाद कोई ये न कहे की सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम न्यायाधीशों ने अपनी आत्मा बेच दी थी।

करीब 2 महीने पहले इन जजों ने मुख्य न्यायाधीश को एक पत्र लिखा था जिसमे उन्होंने मुख्य न्यायाधीश पर वर्षों से चली आ रही परम्पराओं को तोड़कर अपनी मनमानी चलाने का आरोप लगाया था। यह भी लिखा था कि माननीय मुख्य न्यायाधीश ने देश और सुप्रीम कोर्ट से सम्बंधित अति संवेदनशील मामले जिनके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं, ऐसे मामलों को बिना किसी उचित कारण के ‘अपनी पसंद’ के पीठ को सुनवाई के लिए दे दिया।

 

फोटो : पीटीआई

मुख्य न्यायाधीश को जजों को अलग अलग मामले सौंपने का काम दिया जाता है जिसे रोस्टर बनाना कहते है। चिट्ठी में लिखा है कि रोस्टर बनाने की जिम्मेदारी उन्हें एक परंपरा के अंतर्गत दी जाती है और इसका मतलब ये नहीं होता की मुख्य न्यायाधीश सबसे ऊपर होते हैं। असल में वह ‘फर्स्ट अमंग ईक्वल्स’ ही हैं । जजों ने किसी विशेष मामले का ज़िक्र नहीं किया और कहा कि ऐसा करके वे न्यायालय को शर्मिंदा नहीं करना चाहते। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि उनकी नाराजगी के एक प्रमुख कारण मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया का वह मामला है जिसमे दाखिले पर से रोक हटवाने के लिए जजों को घूस देने की बात सामने आई थी जिसमे मुख्य न्यायाधीश पर भी गंभीर आरोप लगाए गए थे और बाद में जस्टिस मिश्रा अपने ही मामले की सुनवाई कर रहे थे जो कि न्यायालय के मौलिक सिद्धांतों के खिलाफ था।

इस प्रेस कांफ्रेंस के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल शुरू हो गई। सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कहा कि प्रधानमंत्री को मामले का संज्ञान लेना चाहिए वहीँ कांग्रेस ने कहा की लोकतंत्र खतरे में है। वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने कहा कि यह कांफ्रेंस ऐतिहासिक है और लोगों को यह जानने का अधिकार है कि अन्दर क्या चल रहा है । वहीँ प्रशांत भूषण ने कहा कि यह गंभीर मामला है और यदि मुख्य न्यायाधीश अपनी शक्ति का दुरूपयोग कर रहे हैं तो किसी को तो आगे आना ही था। वरिष्ठ अधिवक्ता केटीएस तुलसी ने जजों के इस कदम को चौंकाने वाला बताते हुए कहा, ‘ऐसी कोई न कोई वजह जरूर रही होगी, जिसके चलते इतने वरिष्ठ जजों ने यह कदम उठाया. जब वे बोल रहे थे, उनका दर्द उनके चेहरे पर दिखाई दे रहा था.’

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