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भारत को धर्म नहीं रोटी चाहिए : स्वामी विवेकानंद (जन्मदिवस विशेष)

भारत को धर्म नहीं रोटी चाहिए : स्वामी विवेकानंद (जन्मदिवस विशेष)

मात्र 25 वर्ष की आयु में गेरुआ वस्त्र धारण करके समस्त विश्व में भारत के आध्यात्मिकता से परिपूर्ण वेदांत दर्शन को ससम्मान पहुँचाने वाले प्रभावशाली व्यक्तित्व वाले स्वामी विवेकानंद का जन्म आज के ही दिन अर्थात 12 जनवरी, 1863 को कोलकाता में हुआ था। वर्ष 1984 से भारत में यह दिन 'राष्ट्रीय युवा दिवस' के रूप में मनाया जाता है।  

कलकत्ता के एक समृद्ध और शिक्षित कायस्थ परिवार में जन्मे स्वामी विवेकानंद के पिता एक प्रसिद्द वकील थे और दादा संस्कृत व फारसी के विद्वान थे। माता के धार्मिक होने के कारण महाभारत और रामायण जैसे ग्रंथों को कंठस्थ और परिवार का धार्मिक वातावरण उन्हें ईश्वर के प्रति जिज्ञासु बनाता था और कई बार तो उनके प्रश्नों से कथावाचक पंडित जी भी स्तब्ध रह जाते थे। इनके बचपन का नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था। उनकी पढाई प्रतिष्ठित प्रेसीडेंसी कॉलेज से हुई और वह कॉलेज की प्रवेश परीक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने वाले एक मात्र छात्र थे। दर्शन, साहित्य, सामाजिक विज्ञानं, धर्म और इतिहास के गहन अध्ययन के साथ ही वेदों, उपनिषदों, गीता और महाभारत जैसे धर्मग्रंथों का भी अध्ययन किया।  नरेन्द्र को पश्चिमी सभ्यता और दर्शन का शुरूआती ज्ञान जनरल असेंबली इंस्टिटूशन (अब स्कॉटिश चर्च कॉलेज) से मिला।  नरेन्द्र भारतीय शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित थे और ललित कला की परीक्षा भी उत्तीर्ण की थी।  बाद में इमानुएल कांट, बारुक स्पिनोज़ा से लेकर जॉर्ज डब्ल्यू हेगल और चार्ल्स डार्विन के सिद्धांतों का गहन अध्ययन किया। रामकृष्ण परमहंस के सुयोग्य शिष्य नरेन्द्र ने अपना जीवन अपने गुरु को समर्पित किया था और गुरु की मृत्यु के बाद भी उनकी शिक्षा का प्रचार-प्रसार करते रहे और ‘रामकृष्ण मिशन’ की स्थापना की जिसकी शाखाएँ आज विश्व के कई देशों में हैं।  

स्वामी जी ने वर्ष 1893 में अमेरिका के शिकागो में आयोजित प्रतिष्ठित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। इस महासभा में उनके द्वारा दिए गए ओजस्वी भाषण ने न सिर्फ भारत की अमिट और मजबूत छवि अभूतपूर्व ढंग से विश्व के सामने रखी बल्कि उन्हें सदा के लिए अमर कर दिया।  यह वो समय था जब यूरोपीय देशों में भारतीय संस्कृति और हिन्दू धर्म के लोगों को हीन भावना से देखा जाता था और भारत गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था।  उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत इन पंक्तियों से की थी|

“मेरे अमरीकी भाइयो और बहनो!

आपने जिस सौहार्द और स्नेह के साथ हम लोगों का स्वागत किया हैं उसके प्रति आभार प्रकट करने के निमित्त खड़े होते समय मेरा हृदय अवर्णनीय हर्ष से पूर्ण हो रहा हैं। संसार में संन्यासियों की सबसे प्राचीन परम्परा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूँ; धर्मों की माता की ओर से धन्यवाद देता हूँ; और सभी सम्प्रदायों एवं मतों के कोटि कोटि हिन्दुओं की ओर से भी धन्यवाद देता हूँ।“ उन्होंने आगे कहा :

“मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूँ जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृत- दोनों की ही शिक्षा दी हैं। हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते वरन समस्त धर्मों को सच्चा मान कर स्वीकार करते हैं। मुझे ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है। मुझे आपको यह बतलाते हुए गर्व होता हैं कि हमने अपने वक्ष में उन यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट को स्थान दिया था जिन्होंने दक्षिण भारत आकर उसी वर्ष शरण ली थी जिस वर्ष उनका पवित्र मन्दिर रोमन जाति के अत्याचार से धूल में मिला दिया गया था। ऐसे धर्म का अनुयायी होने में मैं गर्व का अनुभव करता हूँ जिसने महान जरथुष्ट जाति के अवशिष्ट अंश को शरण दी और जिसका पालन वह अब तक कर रहा है।"

‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की विचारधारा पर दृढ विश्वास रखने वाले युगपुरुष ने आगे कहा कि  साम्प्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी वीभत्स वंशधर धर्मान्धता इस सुन्दर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी हैं और अब समय आ गया है कि मानव की परस्पर कटुता और धर्मान्धता की मृत्यु हो ।

(स्रोत: विकिपीडिया)

 

इस भाषण के बाद उनकी वक्तव्य शैली और ज्ञान को देखते हुए वहां की मीडिया ने उन्हें ‘साइक्लोनिक हिन्दू’ की संज्ञा दी थी ।

उन्होंने धर्म और कर्मकांडों को अलग करने का साहस दिखाया और रूढ़ियों को तोड़ने के लिए वेद और उपनिषदों के तर्क दिए। उनमे दुर्बलताओं से लड़ने की क्षमता थी और उन्होंने अपने हजारों वर्ष पुराने धर्म की महानता सिद्ध करने के लिए कभी भी अन्य धर्मों को नीचा दिखाने में समय व्यर्थ नहीं किया। असल में वह एक धर्म के प्रचारक मात्र नहीं थे बल्कि धर्मों के झगड़ों में फंसी दुनिया को शांति, प्रेम और एकता का सन्देश देते हुए उन्होंने ये बताया की सभी धर्मों का मूल एक ही है । उन्होंने एक बार कहा था कि “भारत को धर्म नहीं रोटी चाहिए”

एक बार गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था: अगर भारत को जानना चाहते हो तो विवेकानंद को पढो।

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