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भीमा-कोरेगांव युद्ध : अंग्रेजों की ओर से क्यों लड़े थे महार

भीमा-कोरेगांव युद्ध : अंग्रेजों की ओर से क्यों लड़े थे महार

देश जब नव वर्ष के उल्लास और उत्सव में डूबा था उसी समय महाराष्ट्र के पुणे का भीमा-कोरेगांव जातीय हिंसा की आग में जल रहा था और देखते ही देखते यह आग महाराष्ट्र के कोने-कोने में पहुँच गई और पूरे देश में दलित आंदोलन शुरू हो गए। दलितों ने बुधवार को महाराष्ट्र बंद की घोषणा भी की थी और मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने जांच और तत्काल कार्रवाही के आदेश दे दिए हैं। कई जगह इंटरनेट सेवाएं ठप्प कर दी गईं हैं और धारा 144 भी लगा दी गई है। प्रदर्शनों के बाद मुंबई में लोकल रेल सेवाएं भी बाधित हैं। स्कूल और कॉलेज तक बंद कर दिए गए।

मौका था भीमा-कोरेगांव युद्ध की 200वीं वर्षगाँठ कार्यक्रम का जिसे दलित-महार समुदाय एक शौर्य उत्सव के रूप में मनाते हैं। क्या है  भीमा-कोरेगांव युद्ध का इतिहास और लोगों के इस जातीय हिंसा के स्तर पर उतर आने के मुख्य कारण क्या हैं ? अपने ही देश के मराठाओं की पराजय और अंग्रेज़ों की विजय का उत्सव आपको हैरान करता होगा लेकिन इस उत्सव का कारण और इतिहास जानना आज ज़रूरी है। 

भीमा-कोरेगांव युद्ध का संक्षिप्त इतिहास :

आज से 200 साल पहले 1 जनवरी 1818 को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और मराठाओं के बीच महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में लड़े गए युद्ध को भीमा-कोरेगांव युद्ध नाम दिया गया। पेशवा बाजीराव द्वितीय के नेतृत्व में लगभग 28,000 सैनिक पुणे पर आक्रमण करने निकले थे और रास्ते में ही उनका सामना लगभग 800 सैनिकों की एक टुकड़ी से हो गया जो ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का साथ देने के लिए पुणे जा रही थी। यह टुकड़ी 12 घंटों तक पेशवाओं से लड़ती रही।  इस लड़ाई में अंततः ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की जीत हुई और मराठाओं को पीछे हटना पड़ा। इस टुकड़ी में ज्यादातर सैनिक महार जाति से सम्बन्ध रखते थे जो दलित समुदाय का हिस्सा है और पेशवा ब्राह्मण थे जो अपनी सेना में अरब सैनिक तो रखते थे लेकिन महारों को अछूत मानते हुए उन्हें अपनी सेना में स्थान नहीं देते थे। यही कारण है कि महार-दलित समुदाय इस दिन को शौर्य दिवस के रूप में तबसे ही मनाता रहा है।  आपको बताते चलें कि भारत सरकार ने वर्ष 1981 में महार रेजिमेंट के नाम पर स्टाम्प भी जारी किया था। 

यदि इस युद्ध की पृष्ठभूमि का अध्ययन करें तो हम पाएंगे कि यह युद्ध असल में अंग्रेज़ों और मराठाओं के बीच नहीं बल्कि दलित महारों और ब्राह्मण पेशवाओं के बीच लड़ा गया था जिसे महारों ने ब्राह्मण-क्षत्रिय अत्याचारों के विरुद्ध अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए लड़ा था।  इस जीत की ख़ुशी में अंग्रेज़ों ने 1851 में भीमा-कोरेगांव में एक स्मारक 'विजय स्तम्भ' का निर्माण किया जिसे आज ऊंची जातियों के अत्याचार के विरुद्ध छोटी जातियों के विजय का प्रतीक समझा जाता है । इसी स्मारक की ओर बढ़ते हुए दलितों को रोका गया था जिसके फलस्वरूप हिंसा हुई। यह स्मारक दलित समुदाय के लिए तीर्थ के समान है जहां हर साल 1 जनवरी को देश भर से और खासकर महाराष्ट्र से दलित समुदाय के लोग एकत्रित होते हैं। 

इतिहासकार बताते हैं की पेशवाओं द्वारा महारों पर अत्याचार का आलम यह था की उन्हें शहर में घुसने से पहले कमर में झाड़ू बांधनी पड़ती थी ताकि उनके साथ ही उनके क़दमों के निशान मिट जाएं जिसे वे अशुभ मानते थे और गले में उन्हें एक थूकने के लिए बर्तन टांगना पड़ता था ताकि सवर्णों के लिए ज़मीन अपवित्र न हो। दलितों को ऊंची जाति के लोगों के सामने बैठना भी मना था और उन्हें कुँए से पानी भरने की भी मनाही थी। इन कुरीतियों ने ही महारों को अंग्रेज़ों की ओर से लड़ने को मजबूर किया। बाद में अंग्रेज़ों ने महार जाति के उत्थान के लिए कई कार्य किये और उनके बच्चों के लिए कई विद्यालयों का निर्माण भी कराया। कुछ इतिहासकार ये भी कहते हैं कि महारों के मराठों से मतभेद नहीं थे बल्कि ब्राह्मण पेशवाओं से थे क्योंकि ब्राह्मणों ने महारों पर अन्यायपूर्ण नियम थोपे थे और यदि ब्राह्मणो ने छुआछूत ख़त्म करने के प्रयास किये होते तो शायद यह युद्ध नहीं होता। 

वहीँ कई दक्षिणपंथी संगठन इसे अंग्रेज़ों की जीत का उत्सव मनाने के रूप में देखते हैं और इसी कारण उन्होंने इस उत्सव में बाधा पहुंचाई फलस्वरूप राज्यभर में हिंसा फ़ैल गई। इस हिंसा में अबतक 2 लोगों की मौत हो चुकी है। 200 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। 

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