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ट्रोलयुग: अभद्र ट्रोल्स और भद्र मोदी

By:  अनुराग मिश्रा

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विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के अंदर लगातार ऐसी घटनाएं घटित होती दिख रही हैं जिनका स्थान सभ्य समाज में नहीं है और जो लोकतंत्र के लिए भी खतरा हैं लेकिन दुर्भाग्य यह है कि ऐसी अनेक घटनाओं के विरुद्ध एक शब्द भी बोलने पर आपको तथाकथित देशभक्तों द्वारा देशद्रोही घोषित कर दिया जाता है और इन्ही न्यायाधीश देशभक्तों द्वारा इनकी इच्छानुसार मृत्युदंड दिया जाना भी संभव है।

ऑनलाइन समाज से कम सम्बन्ध रखने वालों को पहले इस लेख के शीर्षक का अर्थ समझना होगा। मुक्त ज्ञानकोष विकिपीडिया के अनुसार ट्रॉल का अर्थ कुछ इस प्रकार है : 

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"ट्रॉल इण्टरनेट स्लैंग में ऐसे व्यक्ति को कहा जाता है जो किसी ऑनलाइन समुदाय जैसे चर्चा फोरम, चैट रुम या ब्लॉग आदि में भड़काऊ, अप्रासंगिक तथा विषय से असम्बंधित सन्देश प्रेषित करता है। इनका मुख्य उद्देश्य अन्य प्रयोक्ताओं को वाँछित भावनात्मक प्रतिक्रिया हेतु उकसाना अथवा विषय सम्बंधित सामान्य चर्चा में गड़बड़ी फैलाना होता है।" 

परिभाषा से समझ आता है की ट्रोल शब्द का अर्थ सामान्यतया नकारात्मक रूप में ही समझा जाता है।  चूँकि ऑनलाइन दुनिया में और विशेषकर भारत में मुख्य प्लेटफार्म व्हाट्सएप, फेसबुक और ट्विटर ही हैं तो लाजमी है की ट्रॉल्स की मंडी भी इनपर ही ज्यादा सक्रिय होगी। 2014 के आम चुनाव के पहले ज्यादातर भारतीय राजनीतिक दलों और राजनीतिज्ञों का सोशल मीडिया से बहुत ज्यादा कुछ लेना-देना नहीं था अर्थात वे इस प्रकार से ऑनलाइन दुनिया में सक्रिय नहीं थे जितने की आज हैं, तो ये कहा जा सकता है कि ट्रोल युग का आरम्भ 2014 के आस-पास हुआ और तभी से ट्रोल्स की उत्पत्ति भी हुई। हाँ दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल इस क्षेत्र में अपवाद हैं क्यूंकि 2013 के विधानसभा चुनाव के ऐतिहासिक जीत में उनके दल ने सोशल मीडिया का जैसा सदुपयोग किया वैसा पहले कभी नहीं देखा गया और संभव है कि 2014 के आम चुनाव में नरेंद्र मोदी जी और तमाम नेताओं और दलों को उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला हो।
ट्रोल नामक जन्तु मुख्य धारा में फ़िलहाल भारत की राजनीती में ही पाए जाते हैं और किसी अन्य इंडस्ट्री में अभी तक तो इनका प्रवेश नहीं हुआ है इसलिए यह लेख राजनीतिक ट्रॉल्स को ही समर्पित है। 

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ट्रोल नकारात्मक कैसे हुआ ये भी जानना आवश्यक है। इस देश का संविधान हमे अभिव्यक्ति की आज़ादी देता है। आप सोशल मीडिया,अख़बार,पत्रिका या किसी भी प्लेटफार्म पर देश में घट रही किसी भी घटना पर अपनी राय रख सकते हैं।यह स्वभाविक है कि कोई व्यक्ति जो आपके विरोधी दल या अलग सोच का हो आपसे उसी या किसी अन्य प्लेटफार्म पर असहमति ज़ाहिर करे।लेकिन ट्रोल नकारात्मक और खतरा तब बन जाते हैं जब वे सभी संबंधों,मानवीय आधारों और संवैधानिक मूल्यों को ताख पर रखकर अपने तात्क्षणिक और सामान्यतया राजनीतिक लाभ के लिए सभी सीमाएं लाँघ जाते हैं। और वही ट्रोल लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय तब बन जाते हैं जब देश के प्रधानमंत्री इस देश के करोड़ों सभ्य देशवासियों को दरकिनार कर उन अमर्यादित ट्रोल्स को "फॉलो" करते हैं।देश के प्रधानमंत्री का ऐसे ऑनलाइन अपराधी ट्रोल्स को फॉलो किया जाना उनको संरक्षण देने जैसा है। क्यों न माना जाय कि ऑनलाइन हिंसा को बढ़ावा देने में माननीय प्रधानमंत्री जी भी भागीदार हैं ?मुज़फ्फरनगर दंगे हों या दिल्ली के डॉक्टर की मौत पर हैदराबाद के भाजपा समर्थक द्वारा उसे सांप्रदायिक रंग देना हो, इस ऑनलाइन गुंडागर्दी को हकीकत में तब्दील होते भी हमने खूब देखा है। कई बड़े पत्रकारों ने तो सोशल मीडिया से अकाउंट डिलीट कर दिया क्योंकि सत्ता पक्ष के नीतियों का विरोध करने पर उन्हें ट्रोल आर्मी द्वारा घेरकर हत्या और बलात्कार तक की धमकी दी गई। 

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उदहारण के तौर पर प्रधानमंत्री मोदी द्वारा फॉलो किये जाने वाले कुछ ट्रॉल्स और उनके ट्वीट निचे दिए गए हैं :
हाल ही में निर्भीक पत्रकार गौरी लंकेश की निर्मम हत्या पर अमानवीय ट्वीट करने वालों को प्रधानमंत्री जी फॉलो करते  हैं। 

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