आँखों देखी : फैशनेबुल सोसाइटी का औपचारिक कन्या पूजन

By:  अनुराग मिश्रा

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नवरात्र में आदि शक्ति दुर्गा के नौ रूपों के साथ-साथ कन्या पूजन का बहुत महत्व है। नवरात्र में दुर्गा अष्टमी और नवमी के दिन कन्या पूजन की परंपरा सदियों चली आ रही है।हम सभी ने किसी न किसी रूप में इन परम्पराओं को देखा है या इनका हिस्सा रहे हैं। देवराज इंद्र ने ब्रह्मा जी से आदि शक्ति दुर्गा को प्रसन्न करने की विधि पूछी तो उन्होंने कन्या पूजन को ही सर्वोत्तम विधि बताया।

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आज हम आपके साथ इस वर्ष की दुर्गा अष्टमी से सम्बंधित अनुभव साझा करना चाहते हैं। राजनीती में सक्रिय होने के कारण कई वर्षों से लगभग सभी त्योहारों का निमंत्रण मिलता रहा है और सभी में सम्मिलित होकर हर बार हर धर्म और जाति (क्योंकि हमारे भारत में धर्म के साथ-साथ जातियों के भी अलग-अलग पर्व होने लगे हैं ) के लोगों से मिलना और पर्व मनाना होता रहा है और सभी से बहुत कुछ सकारात्मक रूप में सीखने को भी मिलता है।नकारात्मकता को पीछे छोड़कर हम आगे निकल जाते हैं।

इस बार नवरात्र में कई आयोजनों में सम्मिलित हुए।गरीब -अमीर सभी इस पर्व को धूम-धाम से मनाते हैं लेकिन इनमे से कुछ आयोजनों को देखने के बाद एक सवाल मन को परेशान कर रहा है।

दिल्ली के ही एक मित्र जो कि ठीक-ठाक मध्यम वर्ग कॉलोनी में रहते हैं,आर्थिक दशा औसत है लेकिन उनके परिवारजन दिल्ली के सैनिक फर्म,गोल्फ क्लब जैसे पॉश कॉलोनी जैसा जीवन जीने की अंधी दौड़ में दिन रात दौड़ रहे हैं और वे चाहते भी हैं कि उनसे साथ वैसे ही पेश आया जाय। फैशनेबुल सोसायटी है तो ये "रेस" लाजमी है और इसमें वैसी कोई बुराई भी नहीं है। हालांकि सभी ऐसे ही होंगे ऐसा नहीं है और चूँकि ये घटना सामने घटी इसलिए ये लेख लिखा गया।

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मौका था उसी मित्र के घर कन्या पूजन का । संयोगवश हम वहां उपस्थित थे।एक समय था कि मोहल्ले की ही छोटी और उत्साहित देवियाँ कन्या पूजन के लिए मोहल्ले के अन्य घरों में प्रसाद के लिए जाया करती थी,जहां सभी सामान्य और बराबर थे और उनका व्रत औपचारिकता मात्र नहीं था लेकिन यहां दृश्य कुछ और था। तथाकथित आधुनिक और फैशनेबुल लोग मोहल्ले की या मोहल्ले से दूर की गरीब बच्चियों को एक घंटे के लिए देवी मान लेते हैं। यहां भी कुछ ऐसा ही था। आसपास की गरीब देवियाँ एकत्रित थीं जिन्हे हाथ लगाने में भी उन्हें शर्म आ रही थी और जिन्हे कुछ ही देर बाद अछूत घोषित कर दिया जाना था और शायद घर में प्रवेश करते देखने पर ही दूर से भगा दिया जाना था। जिन्हे प्रसाद भी बच-बच कर दूर से दिया जा रहा था और प्रसाद देने वाली आधुनिक फैशनेबुल महिला देवी के उन्ही रूपों से जिसके लिए उसने 9 दिन व्रत रखा और उपासना की , शारीरिक स्पर्श से कतरा रही थी।

इस औपचारिकता मात्र से आप देवी के किस रूप को प्रसन्न करना चाहते हैं  उसे जिसे आपने देखा ही नहीं है या उसे जो साक्षात् आपके सामने खड़ी है ?

 

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यदि ह्रदय अपवित्र होगा तो नौ दिन के इस तरह के औपचारिक उपवास का क्या फल मिलेगा ये तो देवी माँ ही जाने। व्रत रखने की ऐसी मजबूरी भी क्या है या शायद व्रत और अनुष्ठान करके आप इश्वर के साथ किसी प्रकार की "डील" अर्थात फायदे का सौदा करना चाहते हैं।देवता इस क्रय-विक्रय के फेर में नहीं पड़ने वाले और ऐसे व्रतधारियों को तो सिर्फ निराशा ही हाथ लगेगी।

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